Archive for the ‘कविता’ Category

श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता/कंचनलता चतुर्वेदी

मित्रों ! मैं आज से एक नै शुरुआत कर रहा हूँ | वह है- पुराने रचनाकारों की रचनाओं को कवितापाठ के जरिये आपतक पहुँचाना | इस क्रम में श्री रामदरश मिश्र जी की कविता श्रीमती कंचनलता चतुर्वेदी के स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ | आशा है पुराने रचनाकारों को सम्मान देने का यह तरीका आपको जरूर पसंद आयेगा |इस रचना का वास्तविक आनंद Youtube पर सुन कर ही आयेगा, इसलिए आपसे अनुरोध है कि आप मेरी मेहनत को सफल बनाएं और वहां इसे जरूर सुनें…
 

मतदान कीजिए/प्रांचन प्रणव चतुर्वेदी

इस चुनाव के मौसम में एक सन्देश अपने बेटे की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहा हूँ | इसे आप YOUTUBE पर सुनने और Subscribe का कष्ट करें…

मतदान कीजिए सभी मतदान कीजिए
इस लोकतंत्र पर्व का सम्मान कीजिए

संसद में जो भी जाए वो आदमी अच्छा हो,
हर शख्स से ये आप आह्वान कीजिए

मतदान करना है जरूरी दान की तरह,
किसी पात्र व्यक्ति को ही ये दान कीजिए

अपराधी आ रहे हैं राजनीति में बहुत,
पूरे न आप उनके अरमान कीजिए

हास्यकविता/ जोरू का गुलाम

     मित्रों ! होली के अवसर पर एक हास्य – कविता का आडियो प्रस्तुत कर रहा हूँ | मजे की बात ये है कि ये रचना मैंने उस समय लिखी थी जब अभी मेरी शादी नहीं हुई थी | आशा है आप को ये जरूर पसंद आयेगी…..

                        आप सभी को होली की शुभकामनाएं…

      इस रचना का असली आनंद सुन कर ही आयेगा, इसलिए आपसे अनुरोध है कि नीचे दिए गए लिंक पर इसे जरूर सुनें | आप से अनुरोध है कि आप मेरे Youtube के Channel पर भी Subscribe और Like करने का कष्ट करें…

भयवश नहीं परिस्थितिवश मैं करता हूँ सब काम।
फ़िर भी लोग मुझे कहते हैं जोरू का गुलाम…….।

सुबह अगर बीबी सोई हो, चाय बनाना ही होगा;
बनी चाय जब पीने को तब उसे जगाना ही होगा;
चाय बनाना शौक है मेरा हो सुबह या शाम…….
फ़िर भी लोग मुझे कहते हैं जोरू का गुलाम…….।

मूड नहीं अच्छा बीबी का फ़िर पति का फ़र्ज है क्या;
बना ही लेंगे खाना भी हम आखिर इसमें हर्ज है क्या;
इसी तरह अपनी बीबी को देता हूँ आराम…..
फ़िर भी लोग मुझे कहते हैं जोरू का गुलाम…….।

वो मेरी अर्धांगिनी है इसमें कोई क्या शक है;
इसीलिये तनख्वाह पे मेरे केवल उसका ही हक है;
मेरा काम कमाना है बस खर्चा उसका काम…..
फ़िर भी लोग मुझे कहते हैं जोरू का गुलाम…….।
                          आप सभी को होली की शुभकामनाएं…

जब भी जली है बहू जली है- दहेज़ पर एक रचना

मित्रो, आज आप के लिए दहेज़ पर एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ | आप ने अक्सर देखा होगा जब भी ऐसी कोई खबर आती है तो उसमें सिर्फ बहू जलती है और वह भी तब जब कोई नहीं रहता, सभी जलने के बाद ही पंहुचते है | ख़ास तौर से सीधी-साधी बहुओं के साथ ये ज्यादा होता है | काश ! लोग सभी को इंसान समझते…

जब भी जली है बहू जली है सास कभी भी नहीं जली है |
जब भी जली सब दूर रहे हैं पास कभी भी नहीं जली है |

जितना भी मिलता जाता है उतना ही कम लगता है,
और मिले कुछ और मिले ये आस कभी भी नहीं जली है |

हम हिन्दू तो मरने पर ही लाश जलाया करते हैं,
वो जीते-जी जली है उसकी लाश कभी भी नहीं जली है |

कभी-कभी कुछ ऐब भी अक्सर चमत्कार दिखलाते हैं,
सीधी-साधी जल जाती बिंदास कभी भी नहीं जली है |
इस रचना को यू-ट्यूब जरुर पर सुनिए- 

एक संगीतमय बाल कविता

मित्रों ! अपने पुत्र का एक संगीतमय बाल-कविता पाठ प्रस्तुत कर रहा हूँ-

भारत माँ हम तेरे बच्चे

स्वतंत्रता-दिवस पर देशभक्ति पर आधारित एक बालगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ…

भारत माँ हम तेरे बच्चे,आज शपथ ये खायेंगे |
वक्त पड़ा तो तेरी खातिर, सर को भी कटायेंगे |

हम तेरी गोदी में रहते, हँसते, खाते, पीते हैं |
तेरी ममता की छाया में, हम सारे ही जीते हैं |
तूने हमें आज़ादी दी है, जीवन में कुछ करने की ;
तूने हमें आज़ादी दी है, जैसे चाहे रहने की |
अपनी इस आज़ादी को हम , कैसे भला भुलायेंगे….
वक्त पड़ा तो तेरी खातिर, सर को भी कटायेंगे |

चाहे राम हो  कृष्ण हो चाहे, बुद्ध, महावीर, साईं हों |
नानक, तुलसी, सूरदास हों, मीरा, लक्ष्मीबाई हों |
राजगुरु, सुखदेव, भगतसिंह, नेहरु, गांधी, आज़ाद हों |
तेरी माटी में सब जन्मे, हम भी इनके बाद हों |
अपने कर्मों से हम इनमें, अपना नाम लिखायेंगे |
वक्त पड़ा तो तेरी खातिर, सर को भी कटायेंगे |

 सभी को स्वतंत्रता-दिवस पर  बहुत बहुत बधाई…

मानवता अब तार-तार है

         मित्रों ! उत्तराखंड की घटना ने एक ऐसा घाव छोड़ा है जो शायद बरसों तक नहीं भर सकता | सबसे ज्यादा दुःख तो तब हुआ जब उस समय की कई घटनाओं के बारे में पता चला | कोई पानी बिना मर रहा था और कुछ लोग उस समय पानी का सौदा कर रहे थे और २०० रुपये अधिक दाम एक बोतल पानी का वसूल रहे थे | कुछ उस समय लाशों पर से गहने उतार रहे थे, और इसके लिए उन्होनें उन शवों की उंगलियाँ काटने से गुरेज नहीं किया | उनके सामने कई लोग मदद के लिए पुकार रहे थे मगर उन्होंने उन्हें अनसुना कर अपना काम जारी रखा | क्या हो गया है हमारे समाज को ? मानवता को ? कुछ पंक्तियाँ अपने–आप होंठ गुनगुनाते गए जिन्हें मैं आप को प्रेषित कर रहा हूँ |

       

मानवता अब तार-तार है, नैतिकता अब कहीं दफ़न है |

बीते पल ये कहते गुजरे, संभलो आगे और पतन है |

 

लुटे हुए को लूट रहे हैं, मरे हुए को काट रहे हैं;

कुछ ऐसे हैं आफ़त में भी; रुपये, गहने छांट रहे हैं;

मरते रहे कई पानी बिन, वे अपने धंधे में मगन हैं……

 

जो शासक हैं देख रहे हैं, उनको बस अपनी चिंता है;

मरती है तो मर जाए ये, ये जनता है वो नेता हैं;

आग लगाने खड़े हुए हैं जनता ओढ़े हुए कफ़न है…

 

भर जाते हैं घाव बदन के, मन के जख्म नहीं भरते;

आफ़त ही ये ऐसी आई, करते भी तो क्या करते;

क्या वे फिर से तीर्थ करेंगे, उजड़ा जिनका ये जीवन है…

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