उत्तराखण्ड में प्रकृति की महाविनाशलीला देखने को मिली। गाँव के गाँव बह गए, जाने कितनी जानें गयीं। जाने कितने बेजुबान पशु-पक्षी असमय काल-के गाल में समा गए। समाचार-चैनलों के दृश्य वीभत्स रस की निष्पत्ति कर रहे हैं। सेना और आईटीबीपी के जवान अपनी जान हथेली पर रखकर जिस तरह लोगों की जान बचा रहे हैं, उनके कार्य को शब्दों में बांधने की हिम्मत मैं नहीं करना चाहता; क्योंकि ये जवान इस समय भगवान से कम नहीं हैं। इस विनाश के लिए कौन जिम्मेदार है, इस समय यह चर्चा करने का उचित समय नहीं है, पर लापरवाही, बाँधों को बनाने में नियमों की अनदेखी, आपदा प्रबन्धन की विफलता से कई सवाल तो खड़े होते ही हैं। सबसे बड़ी समस्या इस बात की है कि इतनी बड़ी विनाशलीला के बाद भी हमारे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सत्तारुढ़ और विपक्षी दलों के विभिन्न नेताओं का संवेदनहीन होकर एकदम चुप्पी साध लेना । होना तो ये चाहिए कि इस समय सभी मिलकर इस आपदा का सामना करते, तुरन्त आगे बढ़कर संवेदना दिखाते हुए कहीं नज़र आते; कुछ ऐसा कहते जिससे लोगों के जख्मों पर मरहम लगता, पर ऐसा नहीं हुआ । कई बार संवेदना के कुछ बोल बहुत असरकारक सिद्ध होते हैं, ऐसा लगता है कि कोई है जो हमारी खबर ले रहा है । जिनको इस घटना ने दर्द दिया है, उनका दर्द तो कोई दूर नहीं कर सकता पर उसे बांटने में ये कंजूसी क्यों है, ये समझ से परे है। दिवंगत सभी आत्माओं को श्रद्धांजलि और प्रभावित लोग पुनः सामान्य जीवन जी सकें, ऐसी कामना के साथ-साथ देश के उन वीर जवानों को सैल्यूट……जिनकी वजह से आज हजारों लोग जिन्दा हैं

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Comments on: "प्रकृति की महाविनाशलीला" (6)

  1. सब इंसान की करतूत है , बहुत कुछ सोचने पे विवश करती सार्थक रचना

  2. पृकृति की सरंचना में इंसानी हस्तक्षेप का पृकृति नें जितना बदला लिया है उसके बाद कहने को शब्द नहीं ……….

  3. वीर जवान वाकई प्रशंसा के योग्य हैं.

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