देर से ही सही लेकिन अपनी उपस्थिति पुनः दर्ज करा रहा हूँ। आशा है आप सभी को ये रचना पसन्द आयेगी…….
पर हैं लेकिन कटे हुए हैं।
इक हैं लेकिन बंटे हुए हैं।

अच्छे-अच्छे कहीं नहीं हैं,
गुण्डे आगे डटे हुए हैं ।

आवेदन नौकरी की मत दो,
जिनका होगा छंटे हुए हैं।

वह लड़की है नहीं है लड़का,
जिसके गेसू कटे हुए है।

तन ढकना है जहाँ जरूरी,
कपड़े वही से हटे हुए हैं।

जो तन ढकना चाह रही हैं,
उनके कपड़े फटे हुए हैं।

उनके अच्छे अंक हैं आते,
जो उत्तर को रटे हुए हैं।

सार्वजनिक उद्यान सभी अब,
बस जोड़ों से पटे हुए हैं।

रिश्ते-नाते नाम के हैं बस,
इक-दूजे से कटे हुए हैं।
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Comments on: "पर हैं लेकिन कटे हुए हैं" (22)

  1. .प्रसन्न वदन चतुर्वेदी जी सादर नमस्कार ! बहुत अच्छा लिखते हैं आप … बधाई ! प्रस्तुत ग़ज़ल के इन दो शे'र का जवाब नहीं – तन ढकना है जहां जरूरी,कपड़े वही से हटे हुए हैं। जो तन ढकना चाह रही हैं,उनके कपड़े फटे हुए हैं। दो अलग अलग स्थितियां बख़ूबी उकेरी हैं आपने …फिर से मुबारकबाद !हार्दिक बधाई और शुभकामनाओं सहित -राजेन्द्र स्वर्णकार

  2. अच्छी गज़ल के साथ आपकी वापसी देखकर प्रसन्न्ता हुई। इस गज़ल के ये दो शेर अन्य की तुलना में कम स्तरीय लगे….उनके अच्छे अंक हैं आते,जो उत्तर को रटे हुए हैं।सार्वजनिक उद्यान सभी अब,बस जोड़ों से पटे हुए हैं।…शेष सभी अच्छे लगे।

  3. namaskar chaturvedi ji…kamaal ki lekhni hai aapki…bilkul dil kee gehraaiyon tak mehsoos karaa jaatee hai!!

  4. काफी दिनों बाद आये , लेकिन अच्छे शे'र लेकर आए हैं । शुभकामनायें ।

  5. मेरे ब्लाग पर आने के लिए धन्यवाद… सच्चाई को उजागर करती खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.सादर, डोरोथी.

  6. छोटी बाहर की खूबसूरत ग़ज़ल| दिलचस्प काफिया लिया है आपने| बधाई|

  7. अच्छे शेर हैं सभी प्रसन्न जी … मज़ा आ गया आपकी गज़ल पढ़ के …

  8. पर हैं लेकिन कटे हुए हैं।इक हैं लेकिन बंटे हुए हैं।अच्छे शेर हैं

  9. तन ढकना है जहाँ जरूरी,कपड़े वही से हटे हुए हैं।आधुनिकता को आईना दिखाती बढ़िया ग़ज़ल।

  10. गहरे भाव के साथ बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल लिखा है आपने! शानदार प्रस्तुती!मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-http://seawave-babli.blogspot.com/http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

  11. ख़ूबसूरत ग़ज़ल…..

  12. जो तन ढकना चाह रही हैं,उनके कपड़े फटे हुए हैं। Khoob…. Jeevan ki vidambana aur Virodhabhas ko darshti panktiyan…. bahut sunder

  13. जो तन ढकना चाह रही हैं,उनके कपड़े फटे हुए हैं। जीवन भी क्या है …जिनके पास कपडे हैं वह खुद को ढक नहीं रहे हैं और जिनके पास नहीं है वह कपड़ों के लिए तरस रहे हैं …..बहुत खूब हर शेर अर्थपूर्ण ….आपका आभार

  14. सुन्दर अभिव्यक्ति के साथ भावपूर्ण कविता लिखा है आपने! शानदार प्रस्तुती!आपको एवं आपके परिवार को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-http://seawave-babli.blogspot.com/http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

  15. ख़ूबसूरत ग़ज़ल……..

  16. very interesting ghazal…..

  17. जो तन ढकना चाह रही हैं,उनके कपड़े फटे हुए हैं। आपको साधुवाद है…बहुत अच्छा| kabhi dekhiye is taraf bhiwww. jan-sunwai.blogspot.com

  18. achha ahsas deta hai aapko padhna….great one

  19. बहुत प्यारी प्रभावशाली रचना , बधाई !रंगोत्सव पर आपको शुभकामनायें !

  20. बहुत सुन्दर भाव .बधाई

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