जा रहा है जिधर बेखबर आदमी ।
वो नहीं मंजिलों की डगर आदमी ।


उसके मन में है हैवान बैठा हुआ,
आ रहा है हमें जो नज़र आदमी ।


नफरतों की हुकूमत बढ़ी इस कदर,
आदमी जल रहा देखकर आदमी ।


दोस्त पर भी भरोसा नहीं रह गया,
आ गया है ये किस मोड़ पर आदमी ।


क्या करेगा ये दौलत मरने के बाद,
मुझको इतना बता सोचकर आदमी ।


इस जहाँ में तू चाहे किसी से न डर ,
अपने दिल की अदालत से डर आदमी । 

 हर बुराई सुराखें है इस नाव की,
जिन्दगी नाव है नाव पर आदमी ।
 

आदमी है तो कुछ आदमीयत भी रख,
गैर का गम भी महसूस कर आदमी ।


तू समझदार है ना कहीं और जा,
ख़ुद से ही ख़ुद कभी बात कर आदमी ।

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Comments on: "जा रहा है जिधर बेखबर आदमी" (8)

  1. इस गजल को पढ़ कर कवि प्रदीप का भजन याद आता है। ….कितना बदल गया इंसान ..

  2. इस गजल को पढ़ कर कवि प्रदीप का भजन याद आता है। ….कितना बदल गया इंसान ..

  3. समकालीन समाज की प्रवृत्तियों को आपने बखूबी गजल में पिरो दिया है।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

  4. समकालीन समाज की प्रवृत्तियों को आपने बखूबी गजल में पिरो दिया है।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

  5. Bahut achche.Yun hi likhte rahiye.

  6. Bahut achche.Yun hi likhte rahiye.

  7. Very nice ….Touch my heart…जा रहा है जिधर बेखबर

  8. Very nice ….Touch my heart…जा रहा है जिधर बेखबर

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